अंधविश्वास पर निबंध

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रूपरेखा: परिचय - अंधविश्वास का अर्थ - अंधविश्वास की परम्परा - शिक्षित लोगों में अंधविश्वास - विश्वास और अनुभव की परीक्षा में असफल - तांत्रिकों और पाखंडियों द्वारा शोषण - राजनीतितज्ञों द्वारा स्वार्थ - उपसंहार ।

अंधविश्वास का अर्थ

बिना सोचे-समझे किया जाने वाला विश्वास अथवा स्थिर किया हुआ मत अंधविश्वास है। किन्हीं परम्परागत रूढ़ियों, विशिष्ट धर्माचार्यों के उपदेशों अथवा किसी राजनीतिक सिद्धांत के प्रति विवेक-शून्य धारणा अंधविश्वास है । ऐसे सुदृढ़ विश्वास जिनका प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा समर्थित होना या न होना व्यर्थ रहता है वह अंधविश्वास है। अज्ञान-जनित अविवेकपूर्ण भय तथा पारलौकिक शक्तियों को भोलेपन के साथ स्वीकार करना अंधविश्वास है। इसी प्रकार विज्ञान की कसौटी पर खरी न उतरे आस्था अंधविश्वास हैं।

अंधविश्वास की परम्परा

अंधविश्वास की परम्परा सदियों से चली आ रही है। अंधविश्वास की परम्परा विश्व- व्यापी हो चूका है। आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि भारत में अन्य देश की तुलना में ज्यादा अंधविश्वासी हैं, पर यह एक भ्रामक धारणा है। अंधविश्वास प्रत्येक समाज और प्रत्येक देश में है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दृष्टि से अति विकसित देशों में भी इसका खूब प्रचलन है । जिन बाबाओं, भगवानों और तांत्रिकों में भारतीय समृद्ध वर्ग के लोग, राजनीतिश और कूटनीतिज्ञ आस्था रखते हैं, उन्हीं में पश्चिम के औद्योगिक समाज की भी आस्था स्पष्ट दिखती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. हरबंश मुखिया का कहना है की, अक्सर यह मान लिया जाता है कि अशिक्षित लोग अंधविश्वासों में ज्यादा यकीन करते हैं, जबकि शिक्षित लोग अधिक विबेकपूर्ण और तर्कसंगत होते हैं । यह एक गुमराह करने की साजिस है।

शिक्षित लोगों में अंधविश्वास

शिक्षित लोगों में अंधविश्वास अधिकतर पाए जाते है। उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों के बीच भी अंधविश्वास न केवल प्रर्चालत हैं, बल्कि ऐसे लोगों की आस्था भी इनमें ज्यादा है। चन्द्रास्वामी, बालयोगेश्वर या महेश योगी इसी स्तर में सांस्कृतिक नायक बने हुए हैं। अब तो चमत्कारी बाबाओं की धाक इस बात पर निर्भर करने लगी है कि विदेशों में उनकी कितनी मान्यता है। अनेक सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक अपने निजी जीवन में घोर अंधविश्वासों में लिप्त रहते हैं। ये वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में बहस के आधार पर प्रयोग करते हैं । सत्य की खोज में तर्क एक प्रमुख औजार बन गया है। प्रयोगशाला के बाहर वही वैज्ञानिक आस्थाओं, कर्मकांडों और अन्य कई प्रकार की गैर तार्किक परिस्थितियों में जीते हैं।

विश्वास और अनुभव की परीक्षा में असफल

विश्वास, सत्य और अनुभव जीवन का सहारा हैं। ये तीनों एक-दुसरे पर निर्भर हैं और एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए जरूरी भी हैं | बिना विश्वास के अनुभव नहीं होता और अनुभव सिद्ध हुए बिना किसी बात या तत्त्व को सत्य नहीं मानते। इस प्रकार सत्य और अनुभव के मूल में विश्वास ही है । विश्वास पर ही यह जीवन टिका है। यह मनुष्य की दुर्बलता भी है और शक्ति भी। जब विश्वास अनुभव की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो वह अंधविश्वास और पाखण्ड हो जाता है। मानव जीवन में ऐसे क्षण आते रहते हैं, जब वह अपने आपको असहाय, अकेला, निराश और असहज पाता है। ऐसे में उसे अपने आप से बाहर निकल कर सहारा ढूँढना पड़ता है और उस सहारे के प्रति विश्वास का ताना-वाना बुनना पड़ता है, चाहे वह छलावा ही क्‍यों न हो ? इसी प्रक्रिया में विश्वास, अंधविश्वास और मिथक जन्म लेते हैं।

तांत्रिकों और पाखंडियों द्वारा शोषण

जादू-टोना पर विश्वास तो और भी भयंकर स्थिति है। बीमारी में ओझाओं, गुनियों एवं मन्त्र फूँकने वालों को बुलाना, ताबीज पर आस्था और पोए-पीर पूजा में श्रद्धा वैज्ञानिक प्रगति का घोर अपमान है । इनसे लाखों पाखण्डियों को आश्रय मिलता है, जिनमें साधना का बल नहीं, ज्ञान की ज्योति नहीं, ब्रह्मचर्य का तेज और सात्त्विकता नहीं। अंधविश्वासों का जन्‍म और प्रचलन जीवन की अनबूझ पहेली जैसी स्थिति में नियंत्रण करने के लिए होता है। जब मनुष्य को कोई उचित मार्ग दिखाई नहीं पड़ता तो अंधकार में छटपटाहट से उभरने और बचने के लिए जीने का बहाना ढूँढना पड़ता है । अंधविश्वास ऐसे ही बहानों के बलबूते गढ़े जाते हैं, जीवित रहते हैं और आदमी को जिंदगी में अहम्‌ भूमिका निभाते हैं ।

वही दूसरी ओर औद्योगिकीकरण, नगरीकरण और पश्चिमीकरण को सर्वथा सुरक्षित मानते हुए सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन कौ जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसने हमारे मूल्यों, वरीयताओं, आदर्शों और उनसे जुड़े विश्वासों को झकझोर कर रख दिया है। हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं और साथ ही साथ हमारे विश्वास भी। पर यह सब अपरिहार्य सामाजिक-ऐतिहासिक दबावों के बीच हुआ, न कि परीक्षा के उपरांत या सोच-विचार कर। इस स्थिति का परिणाम यह हुआ कि हम एक अस्पष्ट, संदिग्ध और संशयग्रस्त जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो गये। जीवन में छल, धोखा, प्रपंच और तमाशा प्रधान होते गये। साझेदारी और परस्पर भरोसे के स्थान पर दंभ और अहंकार का वर्चस्व बढ़ता गया। तब विश्वास का स्थान अंधविश्वास ने लिया और सामाजिक जड़ता विविध रूपों में प्रकट होने लगी। आज बौद्धिकता के प्रबल आग्रह की जमीन में भी सत्य, शिव, सूंदर की दुहाई देने वाले देश में, सत्य की अनुभूति की जिज्ञासा करने वाले नचिकेता के देश में अब कोरे विश्वास, खोखले विश्वास, अनुभव को मुँह चिढ़ाते विश्वास चारों ओर चुनौती दे रहे हैं। उनकी चुनौती तो कोई नहीं स्वीकारता। हाँ, उन्हें हथियार बनाकर या ढाल बनाकर अपना उल्लू जरूर सीधा करने की कोशिश होती रहती है।

राजनीतितज्ञों द्वारा स्वार्थ

विश्वास राजनीतिक दाँव-पेंच का हथकंडा हो चला है। मध्य-युग में एक साहसी संत ने व्यर्थ की रूढ़ियों, लोकाचारों और क्षुद्र-विचारों का न केवल विरोध किया, अपितु व्यंग्य की धार से काटा भी। इस संत का नाम है कबीर। उदात्त भविष्य के इस महानायक ने हिन्दू और मुसलमानों के अंधविश्वासों की एक साथ खिलली उड़ाई थी। राजनितिक स्वार्थ के लिए आज अंधविश्वास का प्रयोग कर रहे है जिससे वह अपने सत्ता पर पकड़ जमाये रखे।

उपसंहार

वर्तमान समाज को आज कबीर चाहिए जो न केवल भारत को अंधविश्वास, नकारात्मक रूढ़ियों और अहितकर लोकाचारों से मुक्ति दिला सके, बल्कि सम्पूर्ण विश्व तार्किक सत्य, अनुभव और विश्वास पर जी सके। अंधविश्वास को मिटाना किसी भी देश के लिए बहुत जरुरी हो गया है क्यूंकि अंधविश्वास किसी भी देश को उनत्ति करने से रोकता है। तथा देश के युवाओं को भविष्य में सही राह में चलने में रूकावट पैदा करता हैं।

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